Home Uncategorized अमेरिका की दादागिरी पर चीख पड़ा यूरोप, शुरू हुआ दुनिया का नया डिजिटल विश्व युद्ध?

अमेरिका की दादागिरी पर चीख पड़ा यूरोप, शुरू हुआ दुनिया का नया डिजिटल विश्व युद्ध?

Editor Pranjal

by rajasthan crimepress

अमेरिका ने टैरिफ की तरह ही इस बार वीजा पॉलिसी का इस्तेमाल किया है. इस कारनामे की वजह से ट्रंप ने अपने पुराने दोस्तों की नाराजगी मोल ले ली है. ट्रंप को यूरोपीय देशों की डिजिटल पॉलिसी पसंद नहीं आई और उन्होंने अपनी तानाशाही जाहिर करते हुए इन्हें सजा देने का फैसला किया. ट्रंप के इस फैसले के बाद यूरोप ने एक साथ मिलकर गुस्सा जाहिर किया है, जिसके बाद दोस्त देशों के बीच तनाव की स्थित पैदा हो गई है. मौजूदा हालात किसी डिजिटल युद्ध से कम नहीं हैं.

पेरिस: ट्रंप के राज में अमेरिका की पॉलिसीज किसी दादागीरी से कम नहीं दिख रही हैं. टैरिफ थोपने से लेकर वीजा तक ट्रंप ने एक के बाद एक कई देशों को नाराज किया है. वहीं, हाल ही में एक बार फिर से कुछ ऐसा ही कारनामा करके उन्होंने अपने सहयोगी देशों की भी नाराजगी मोल लेली है. ट्रंप ने अपने पुराने सहयोगियों यानी यूरोपियन यूनियन से बात मनवाने के लिए तानाशाही का रास्ता चुना है, जिसे इन देशों ने पीठ में छुरे की तरह माना है. मामला यूएस के वीजा बैन को लेकर है, जिसके बाद एक तरह से डिजिटल विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई है.
अमेरिका का वो फैसला जिससे नाराज हुआ यूरोप
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पुराने सहयोगियों यानी यूरोपीय देशों की पीठ में छुरा घोंपते हुए 5 दिग्गजों पर ‘वीजा बैन’ लगाने का फैसला सुना दिया. वाशिंगटन ने मंगलवार को फ्रांस के पूर्व ईयू कमिश्नर थिएरी ब्रेटन समेत 5 यूरोपीय नागरिकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया. उनका आरोप है कि जिन पर बैन लगाया गया है वो ऑनलाइन नफरत और झूठ बोलने की आजादी का गला घोंट रहे हैं और एलन मस्क के X जैसे अमेरिकी टेक दिग्गजों को टारगेट कर रहे हैं.
ट्रंप इससे पहले भी यूरोपीय देशों को ये बोलकर बेइज्जत कर चुके हैं कि ‘यूरोप अप्रासंगिक होता जा रहा है और वहां की सरकारें सिर्फ लालफीताशाही और सेंसरशिप में बिजी हैं’.
कौन हैं थिएरी ब्रेटन?
थिएरी ब्रेटन यूरोप के डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) की नींव रखने के लिए जाने जाते हैं. ये वही कानून है जो एलन मस्क जैसे अरबपतियों के लिए मुसीबत बन गया था और ब्रेटन की वजह से मस्क के ‘X’ पर 120 मिलियन यूरो का भारी-भरकम जुर्माना लगा था. मस्क ने गुस्से में ब्रेटन को यूरोप का तानाशाह तक कह डाला था.
वहीं, जब ट्रंप ने मस्का का बदला वीजा बैन लगाकर लिया तो ब्रेटन ने भी पलटवार करते हुए पूछा था कि ‘क्या मैककार्थी का काला दौर वापस आ गया है?’ बता दें कि यह 1950 के दशक का वह खौफनाक दौर था जब अमेरिकी सीनेटर मैककार्थी ने बिना सबूतों के हजारों निर्दोषों को ‘देशद्रोही’ बताकर उनकी आजादी और करियर बर्बाद कर दिया था.
एक सुर में बोले फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन
इस कार्रवाई के बाद यूरोप चीख पड़ा है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने साफ कह दिया है कि हम झुकेंगे नहीं. फ्रांस के बाद जर्मनी के न्याय मंत्रालय ने कड़े शब्दों में कहा कि यह ‘अस्वीकार्य’ है. अमेरिका ने जर्मनी की संस्था HateAid की कार्यकर्ताओं पर भी बैन लगाया गया है, जिस पर बर्लिन ने दो टूक सुना दिया और कहा कि ‘हम डिजिटल स्पेस में कैसे जिएंगे, इसका फैसला अमेरिका नहीं करेगा’.

इस जंग में ब्रिटेन भी कूदा है और अमेरिका के फैसले पर नाराजगी जताई है. ग्लोबल डिस्इंफॉर्मेशन इंडेक्स के प्रवक्ता ने इसे ‘सत्तावादी हमला’ करार दिया है और कहा है कि ट्रंप उन आवाजों को चुप कराना चाहता है जिनसे वे असहमत हैं. ब्रिटेन की प्रतिक्रिया इसलिए अहम है क्योंकि इस देश को अमेरिका का सबसे वफादार पार्टनर माना जाता है और आमतौर पर ये देश अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर आंख बंद करके अमेरिका का साथ देता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.

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