जयपुर: राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार को अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा को लेकर केंद्र सरकार पर अपना हमला और तेज कर दिया। उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के उस दावे को “भ्रामक और तथ्यों से पूरी तरह परे” बताया, जिसमें कहा गया था कि अरावली क्षेत्र के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही खनन की अनुमति दी जाएगी।
गहलोत ने भूपेंद्र यादव के इस तर्क का भी विरोध किया कि अधिकांश अरावली क्षेत्र टाइगर रिजर्व और वन्यजीव अभयारण्यों के कारण पहले से सुरक्षित है। उन्होंने राजस्थान सरकार के 2025 के उस प्रस्ताव का हवाला दिया, जिसमें सरिस्का टाइगर रिजर्व के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) को “तर्कसंगत” बनाने की बात कही गई है। गहलोत ने बताया कि राज्य सरकार ने पहले 881 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को CTH घोषित किया था, जहां संरक्षित क्षेत्र से 1 किलोमीटर के दायरे में खनन पर प्रतिबंध था।
पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव—जिसे आधिकारिक तौर पर भूमि “अदला-बदली” बताया गया—का मकसद उन 50 से अधिक संगमरमर और डोलोमाइट खदानों को दोबारा खोलना था, जिन्हें संरक्षित क्षेत्र के नजदीक होने के कारण बंद किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव को असाधारण जल्दबाजी में मंजूरी दी गई।
गहलोत ने कहा कि राजस्थान राज्य वन्यजीव बोर्ड ने 24 जून 2025 को इस प्रस्ताव को मंजूरी दी, इसके अगले ही दिन नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने इसे स्वीकृति दे दी और 26 जून को नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्थायी समिति से भी हरी झंडी मिल गई। उन्होंने बताया कि 6 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी, और यह सवाल उठाया कि जो प्रक्रिया आमतौर पर महीनों लेती है, वह मात्र 48 घंटे में कैसे पूरी हो गई।
गहलोत ने 5 सितंबर 2023 की उस अधिसूचना का भी जिक्र किया, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करने वाली सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया। उन्होंने कहा कि पहले सीईसी के सदस्यों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से होती थी, लेकिन अधिसूचना के बाद केंद्र सरकार ने नियुक्तियों पर नियंत्रण कर लिया, जिससे समिति की स्वतंत्रता कमजोर हुई।
उन्होंने आरोप लगाया कि अब यह समिति सुप्रीम कोर्ट की सहायता करने के बजाय मंत्रालय के निर्देशों पर काम कर रही है। गहलोत ने सवाल उठाया, “जब केंद्र और राजस्थान सरकार बार-बार पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं, तो फिर केंद्रीय मंत्री के इस दावे पर कौन भरोसा करेगा कि खनन केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा?”
अंत में उन्होंने कहा, “पहले अरावली की परिभाषा बदली गई, अब सरिस्का की संरक्षित सीमा से छेड़छाड़ की जा रही है। राजस्थान अपनी प्राकृतिक धरोहर के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा।”