नई दिल्ली। जुलाई–अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए हिंसक आंदोलनों ने न केवल शेख़ हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया, बल्कि देश को उस आर्थिक और राजनीतिक रास्ते से भी भटका दिया, जिस पर वह पिछले कई वर्षों से आगे बढ़ रहा था। यह घटनाक्रम अब भारत के लिए भी गंभीर रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौती बनता जा रहा है।
आर्थिक प्रगति पर लगा ब्रेक
साल 2020 तक बांग्लादेश की आर्थिक विकास दर भारत से तेज मानी जा रही थी। लेकिन 2024 में आरक्षण व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ युवा आंदोलन हिंसक हो गया और देश में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही। इसके चलते विदेशी निवेश घटा, रोजगार प्रभावित हुआ और आर्थिक ढांचा कमजोर पड़ गया।
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी के अनुसार, चुनी हुई सरकार के अभाव और अंतरिम प्रशासन की निष्क्रियता ने हालात और बिगाड़ दिए। अराजकता और लक्षित हिंसा ने अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाया है।
लोकतंत्र से भीड़तंत्र की ओर
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के एक नेता के बयान—“देश में लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र क्यों आ गया?”—से मौजूदा स्थिति की गंभीरता झलकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ता का संवैधानिक हस्तांतरण न होकर सड़कों के दबाव में बदलाव होना ही आज की अस्थिरता की बड़ी वजह है।
भारत-विरोधी ताकतों को मिला मौका
विशेषज्ञों के अनुसार, शेख़ हसीना के सत्ता में रहते भारत-विरोधी गुट प्रभावी नहीं हो पाए थे। लेकिन अब वही ताकतें राजनीतिक रूप से मजबूत हो गई हैं। ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत का कहना है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का दबदबा बढ़ रहा है और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो रही हैं।
अंतरिम सरकार पर सवाल
नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बीते डेढ़ साल में न तो रोजगार, न युवाओं के मुद्दे और न ही आर्थिक सुधारों पर कोई ठोस पहल दिखी है। कट्टरपंथ के खिलाफ सख्त रुख की कमी ने भी चिंता बढ़ाई है।
भारत-बांग्लादेश रिश्तों में तनाव
इंकलाब मंच के नेता शरीफ़ उस्मान हादी की हत्या के बाद फैली अफवाहों—कि आरोपी भारत भाग गए—से दोनों देशों के संबंधों में और खटास आई है। भारत की एक संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 1971 के बाद यह बांग्लादेश में भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक संकट माना जा रहा है।
आगे क्या?
विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक सुधार नहीं आते, तब तक भारत-विरोधी भावना को घरेलू राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जाता रहेगा। भारत के लिए इसमें सीधे हस्तक्षेप की गुंजाइश कम है, क्योंकि यह बांग्लादेश का आंतरिक मामला है।
अंततः बांग्लादेश के भविष्य की दिशा वहां की जनता और नेतृत्व को तय करनी होगी—लोकतांत्रिक और प्रगतिशील रास्ता या कट्टरपंथ और अराजकता का रास्ता।